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मेरा गीत

मैं क्यों आज तक उसकी ख़ाहिश करता हूँ

मैं क्यों आज तक उसकी ख़ाहिश करता हूँ
जो मुझको भीड़ में अकेला छोड़कर गया है
सुबह आज भी उसको आइनों में जोड़ता हूँ
जो मेरे दिल को खिलौने-सा तोड़कर गया है…

बे-तस्कीनियाँ उजले चेहरों से बढ़ती हैं
हर पल मुझको अक्स की तरह पढ़ती हैं
अंधेरी रात है मैं छत पर तन्हा बैठा हूँ
एक-एक पल दोपहर-सा गुज़र रहा है…

कोई उठाये मुझको या फिर बैठा रहने दे
ख़ाबों के जंगल जलाये ना, धुँआ उड़ाये ना
ख़ाहिशों का अम्बार है, दिल ज़ार-ज़ार है
आँखों की नदिया सुखाये ना, चाँद जलाये ना

अजीब धुनकी में है दिल और कुछ नहीं है
दर्द का ग़ुबार है दिल और कुछ नहीं है
मुस्कुराहट जब खिली गुलाबी लबों पर
एक हसीन ख़ाब सारी रात जागता रहा है…

एक नयी परवाज़ दिखायी दी है आसमाँ में
कुछ नये अन्दाज़ भी हैं उसकी ज़बाँ में
बाँट नहीं सकता किसी से लम्हों के टुकड़े
ख़ुदाया मेरा कोई नहीं इतने बड़े जहाँ में


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

By Vinay Prajapati

Vinay Prajapati 'Nazar' is a Hindi-Urdu poet who belongs to city of tahzeeb Lucknow. By profession he is a fashion technocrat and alumni of India's premier fashion institute 'NIFT'.

8 replies on “मैं क्यों आज तक उसकी ख़ाहिश करता हूँ”

कोई उठाये मुझको या फिर बैठा रहने दे
ख़ाबों के जंगल जलाये ना, धुँआ उड़ाये ना

dekh to dil ke jaan se uthta hai
yeh dhuan sa kahan se uthta hai

http://www.youtube.com/watch?v=NsDScxa–h8

मैं क्यों आज तक उसकी ख़ाहिश करता हूँ
जो मुझको भीड़ में अकेला छोड़कर गया है
सुबह आज भी उसको आइनों में जोड़ता हूँ
जो मेरे दिल को खिलौने-सा तोड़कर गया है…

beautiful!

एक नयी परवाज़ दिखायी दी है आसमाँ में
कुछ नये अन्दाज़ भी हैं उसकी ज़बाँ में
बाँट नहीं सकता किसी से लम्हों के टुकड़े
ख़ुदाया मेरा कोई नहीं इतने बड़े जहाँ में

kuch udaasi dikhi yahan…..par iska sheershak kheench laya …..behad jazbaati

@ madhu ji… I have retail version audio collection of mehdi hasan, thanks for giving me link to this video… great work!

@ Anurag ji… Main sabhii bhavon mein likhana pasand karta hoon, thanks for your valuable comment!

अंधेरी रात है मैं छत पर तन्हा बैठा हूँ
एक-एक पल दोपहर-सा गुज़र रहा है…
” ah! touched my heart, so emotional”
Regards

बहुत दिनों से बाहर था इसलिए आपकी रचनाओं से वंचित रहा -आज का दिन है और आप है बस आपको ही पढ़ना है अभी तक सितम्बर व आधा अगस्त कि ही रचनाये पढ़ पाया हूँ -=कमेंट्स में उलझ गया तो पढ़ना रह जावेगा -जपो भीड़ में अकेला छोड़ गया उसी की तमन्ना करना यही तो प्यार है नहीं तो बदला है ==जो तुमको छोड़ कर जाए उसे जाने दो -अपना होगा तो जरूर लौटेगा और नहीं लौटा तो वोह अपना कभी था ही नहीं

@ ब्रिज, हाँ सच हो सकता है जो तुम कह रहे हो पर जीने को कोई झूठा बहाना बहुत है।

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